यह गंध के अधीन रहती है , अर्थात् इसे दुर्गँध तनिक भी नहीँ सुहाती और सुगंध पाने के लिए सदैव लालायित रहती है । बुद्धिमान चतुर संत को चाहिए कि वह ज्ञान विचार से इसको समान संयम ( वश ) मेँ रखेँ अर्थात् सुगंध और अपयश दोनोँ को सहे ।
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